चंडीगढ़, 21 अप्रैल: शिक्षा जगत में तीन दशकों से अपनी सेवाएं दे चुके डॉ. हरजिंदर सिंह रोज़ की बहुप्रतीक्षित पुस्तक “फ्रोम जैतेवाली टू दी हाल्स ऑफ एकेडमिया” का विमोचन मंगलवार को चंडीगढ़ प्रेस क्लब में किया गया। इस अवसर पर शिक्षा, साहित्य और समाज के कई प्रतिष्ठित लोग उपस्थित रहे।
यह पुस्तक केवल एक आत्मकथा नहीं है, बल्कि भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली की जमीनी हकीकतों का सजीव दस्तावेज भी है। लेखक ने अपने अनुभवों के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था की मजबूती, चुनौतियों और विरोधाभासों को ईमानदारी से प्रस्तुत किया है।
डॉ. रोज़ की यह कृति जीवन के संघर्ष और संतोष दोनों पहलुओं को गहराई से उजागर करती है। पंजाब के जैतेवाला गांव के साधारण परिवेश से निकलकर अकादमिक दुनिया में पहचान बनाने तक की उनकी यात्रा प्रेरणादायक है।
पुस्तक में ग्रामीण जीवन की भावनात्मक और सामाजिक झलक भी देखने को मिलती है। इसमें पारंपरिक मूल्यों के बदलाव और शिक्षा के माध्यम से समाज में आए परिवर्तन को प्रभावशाली तरीके से दर्शाया गया है।
करीब 478 पन्नों और 29 अध्यायों में सिमटी यह पुस्तक पाठकों को शिक्षा जगत के भीतर की कई सच्चाइयों से रूबरू कराती है। भटिंडा स्थित तलवंडी साहिब गुरु काशी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति के रूप में लेखक ने अपने अनुभव साझा किए हैं।
डॉ. रोज़ ने अकादमिक इनब्रीडिंग, रिसर्च में गिरती नैतिकता, धीमी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और बढ़ते हस्तक्षेप जैसे गंभीर मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी है। उन्होंने यह भी बताया कि नेतृत्व शैली और नीतिगत फैसले शिक्षा की गुणवत्ता को किस तरह प्रभावित करते हैं।
पुस्तक में बार-बार नेतृत्व परिवर्तन, योग्यता से समझौता और संस्थानों में निरंतरता की कमी जैसे विषयों पर भी गंभीर चर्चा की गई है। ये पहलू उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति पर गहन चिंतन को प्रेरित करते हैं।
हालांकि यह कृति केवल समस्याओं तक सीमित नहीं है, बल्कि समाधान की दिशा भी दिखाती है। इसमें मेंटरशिप, बौद्धिक ईमानदारी और शिक्षकों की सामाजिक जिम्मेदारी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशेष जोर दिया गया है।
डॉ. रोज़ ने अपने अनुभवों के आधार पर छात्रों के मार्गदर्शन, शोध संस्कृति को मजबूत करने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। उनके विचार शिक्षा के उद्देश्य को नई दिशा देते हैं।
पुस्तक में लेखक के व्यक्तिगत संघर्षों का भी उल्लेख है, जैसे पढ़ाई के लिए लंबी दूरी तय करना, पेशेवर चुनौतियों का सामना करना और निजी जीवन की कठिनाइयों से जूझना। यह सभी अनुभव उनके दृष्टिकोण को और अधिक सशक्त बनाते हैं।
कुल मिलाकर, “फ्रोम जैतेवाली टू दी हाल्स ऑफ एकेडमिया” आत्मकथा, विश्लेषण और चिंतन का एक सशक्त संगम है। यह न केवल एक प्रेरक जीवन यात्रा को प्रस्तुत करती है, बल्कि पाठकों को शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य और उसकी वर्तमान स्थिति पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती है।






